फणीश्वरनाथ रेणु की जीवनी |फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन परिचय |Phanishwar Nath Renu Biography in Hindi - Daily Hindi Paper | RPSC Online GK in Hindi | GK in Hindi l RPSC Notes in Hindi

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गुरुवार, 3 मार्च 2022

फणीश्वरनाथ रेणु की जीवनी |फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन परिचय |Phanishwar Nath Renu Biography in Hindi

फणीश्वरनाथ रेणु की जीवनी (फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन परिचय)

फणीश्वरनाथ रेणु की जीवनी |फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन परिचय |Phanishwar Nath Renu Biography in Hindi


फणीश्वरनाथ रेणु की जीवनी (फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन परिचय)

फणीश्वरनाथ 'रेणु' का व्यक्तित्व : 


हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आंचलिक साहित्यिक फणीश्वनाथ 'रेणु' का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार प्रांत के अत्यंत पिछडे और शोषित पूर्णिया जिले के औराही हिंगना नामक ग्राम में हुआ।

 

रेणु के पिताजी श्री. शिलानाथ जी मंडल धानुक जाति के संपन्न कृषक होने के साथ राष्ट्रीय विचारधारावाले आर्य समाजी थे। माताजी श्रीमती पानोदेवी धर्मभीरू और ईश्वरभक्त आदर्श गृहिणी थी।

 

अपने गाँव में बाल्यावस्था के दिनों रेणु की आर्थिक स्थिति कमजोर रही। उन दिनों खेती की कोई खास सुविधा न होने के कारण उनके परिवार के पास जमीन होकर भी आर्थिक लाभ विशेष न था। जब 1950 के बाद खेती में कुछ सुधार हुए तो उनकी आर्थिक स्थिति में थोडा सुधार होने लगा।

 

रेणु का मूल नाम फणीश्वरनाथ मंडल था। उनका नाम रेणु कैसे हुआ इसके बारे में अनेक दिलचस्प दास्ताने कही जाती हैं। पर इसके बारे में स्वयं रेणु ने लिखा है कि, “रेणु नाम श्री. कृष्णप्रसाद जी कोईराला का दिया हुआ है। 1. इसप्रकार रेणु के पिताजी के मित्र द्वारा उनका यह नामकरण हुआ है, जो अंत तक उनके साथ जुड़ा रहा।

 
फणीश्वरनाथ रेणु का पारिवारिक जीवन :

 

रेणु के तीन विवाह हुए। इसके लिए ग्राम्य परंपरा, समाजवादी विचारधारा का प्रभाव तथा भावनाओं का आक्रमण आदि बातें जिम्मेदार रही हैं।

 

ग्राम्य परंपरा के नुसार 1939 में 18 वर्ष की उम्र में उनका विवाह बलवा ग्राम के श्री. काशीनाथ मंडल की कन्या सुलेख देवी से संपन्न हुआ।

 

अशिक्षित सुलेखदेवी के साथ उनका गार्हस्थ जीवन सामान्य स्तर का रहा। बाद में लकवा नथा मस्तिष्क की बीमारी से ग्रस्त हो 1950 के आसपास वे परलोक सिधार गयी। बीमारी से त्रस्त सुलेखदेवी का जीवित रहना न रहना समान ही था। वे अपनी जीवनी शक्ति समाप्त कर चुकी थी तो उस वक्त परिवार जनों के बढ़ते दबाव से रेणुने दुसरा विवाह करना स्वीकार किया। उन दिनों समाजवादी विचारधारा से बहुत प्रभावित तथा क्रांतिकारी विचारों से ओतप्रोत रेणु ने चुमौना महम दिया ग्राम की श्री. खूबलाल विश्वास की विधवा बेटी पद्मादेवी से 1949 में विवाह किया।

 

पूर्व पत्नी की तरह अशिक्षित पद्माजी के साथ रेणु का दांपत्यजीवन सफल रहा। रेणु के साहित्यिक तथा व्यस्त जीवन में वे कभी रूकावट नहीं बनी और न ही रेणु को घरेलु चिंताओं से ग्रस्त होने दिया। रेणु के घर का सारा प्रबंध स्वयं उन्होंने अपने ऊपर लिया उसे खूबी से निभाया। साथ में उन्हें रेणु के प्रति कभी कोई शिकायत नहीं रहीं। रेणु के लिए अशिक्षित पद्मादेवी का समर्थ साथ गार्हस्थ जीवन को संभालने तक ही रहा पर रेणु के साहित्यिक जीवन के लिए उनकी तृतीय पत्नी लतिकाजी का सहयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा। रेणु की कीर्ति पताका फहराने में लतिकाजी का योग अत्यंत महत्त्वपूर्ण और सतत कर्म प्रेरक रहा है।

 

स्वतंत्रता आंदोलन में बंदी बनाये रेणु को प्रकृति अस्वास्थ्य के कारण 1944 में भागलपुर जेल से पटना अस्पताल में प्लूरिसी मरीज के रूप में दाखिल किया गया। वहाँ उनकी पहचान परिचारिका लतिका राय चौधरी से हुई, जिन्होंने उनकी दिलोजान से सेवा की।

 

रेणु ने एक जगह लिखा है,

 

प्रेम में पड़ जाने का एकमात्र स्थान आज भी अस्पताल है। 

 

रेणु का यह सिद्धांत कथन उनके बारे में योग्य सिद्ध हुआ। उन्हें लतिकाजी से प्यार हो गया। रेणु की जिद तथा रेणु से प्यार आदि बातों के कारण लतिकाजी ने 1952 में रेणु से विवाह किया। शादी के उपरांत रेणु के द्वितीय विवाह तथा उनकी बीती हुई" जिंदगी के बारे में जानकारी मिलने पर भी वे रेणु से गुस्सा नहीं हुई । उन्होंने सच्चे मन से रेणु के जीवन को संभाला। कभी किसी प्रकार की असंतुष्टि का परिचय नहीं होने दिया। रेणु की प्रौढ कृतियों की सर्जना तथा प्रकाशन में लतिका जी का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। रेणु के साहित्यिक जीवन में लतिकाजी प्रेरणा के रूप में खड़ी रही हैं।

 

इस प्रकार पद्माजी तथा लतिकाजी जैसी साक्षात त्याग की मूर्ति बनी भारतीय स्त्रियों को पाकर रेणु का जीवन धन्य हो गया। रेणु को कीर्ति के शिखर पर ले जाने में इन स्त्रियों का त्याग महत्त्वपूर्ण रहा है। इन स्त्रियों की मूक साधना से रेणु की साहित्य साधना सफल बन सकी है।

 

रेणु के आठ संतानें थीं। प्रथम पत्नी से उत्पन्न एक पुत्री तथा द्वितीय पत्नी से उत्पन्न सात संतानें जिनमें चार पुत्रियाँ तथा तीन पुत्र थे। इन संतानों को रेणु ने प्यार तो खूब दिया पर पिता के दायित्व का निर्वाह करने में वे शायद कुछ कम साबित हुए हैं। क्योंकि इतने ख्याति प्राप्त लेखक होने के बाद भी उन्होंने बच्चों की शिक्षा दीक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दिया।

 

फणीश्वरनाथ रेणु  की शिक्षा दीक्षा :

 

रेणु की प्रारंभिक शिक्षा की शुरूवात घर में ही हुई। हिंगना में श्री. कुसुमलालजी मंडल नाम के अध्यापक घर में आकर ही रेणु को पढाया करते थे। घर में ही अक्षर बोध होने के बाद कुछ दिन अररिया के विद्यायल में शिक्षा ग्रहण करने के बाद सिमरबनी और फारविसगंज में शिक्षा प्राप्त की। रेणु विद्यालय में तो जाते रहे पर शिक्षा के प्रति उनकी विशेष रूचि न थी। वे अक्सर स्कूल से भाग जाते जिसके कारण उन्हें कई बार पिताजी के क्रोध का सामना करना पड़ा। गणित में उनकी विशेष रूप से अरूचि थी। फिर भी अन्य विषयों के अध्ययन तथा समाज की स्थिति के अध्ययन में वे दक्ष थे।

 

ऐसे ही एक दिन संयोगवश प्रथम श्रेणी के रेल डिब्बे में उनकी मुलाकात विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला से हुई जो नेपाल के गांधी इस नाम से विख्यात तथा नेपालके शैक्षणिक और राजनैतिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखनेवाले कृष्णप्रसाद कोइराला के पुत्र थे। विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला तथा रेणु के पिता दोनों पुराने मित्र थे। उन्होंने वहाँ के आदर्श विद्यालय में रेणु को दाखिल कर दिया जहाँ से रेणुने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में दाखिल हुए पर उनके व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन ने उन्हें किताबी शिक्षा पूरी करने का मौका नहीं दिया। वे अपनी पढ़ाई छोड़ राजनीति में सक्रिय हुए।

 

फणीश्वरनाथ रेणु  का राजनीतिक जीवन :

 

कोइराला परिवार में रेणु के व्यक्तित्व का विकास हुआ। उदार राष्ट्रीय विचारधारा तथा मानवीय कल्याण की भावना से ओतप्रोत कृष्णप्रसाद कोइराला का प्रभाव रेणु पर पड़ा। उसी परिवार में उन्हें क्रांति के संस्कार प्राप्त हुए। रेणु के परिवार का स्वतंत्रता आंदोलन में फरार नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को प्रश्रय देकर स्वतंत्रता आंदोलन में अप्रत्यक्ष रीति से सहयोग रहा था। स्वयं रेणुने इस विषय में स्पष्ट किया है कि,

 

मेरे जन्म से पूर्व ही तिलक स्वराज फंड वसूलने के दिन से ही इलाके में मेरा परिवार राष्ट्रीय परिवारों में से एक समझा जाता रहा है । ”3

 

इसप्रकार किशोरावस्था से ही रेणु के मनोमस्तिष्क पर राष्ट्रीयता का गहरा नशा छा उनके भीतर एक क्रांतिकारी जन्म ले रहा था। उसी समय सामाजिक, धार्मिक तथा राजनैतिक परिस्थितियाँ अपना अलग अलग प्रभाव रेणु के युवा मनपर छोड़ रही थीं, जिसके परिणामस्वरूप पढ़ाई छोड रेणु ने सक्रिय राजनीति में हिस्सा लिया। इस तरह 1939 में उनके राजनीतिक जीवन का प्रारंभ हुआ। जयप्रकाश नारायण, श्री. बी.पी. सिन्हा आदि लोगों का उन्हें साथ रहा। इस काल में उन्होंने 1941 को व्यक्तिगत सत्याग्रह में हिस्सा लिया। अंग्रेज सरकार के कारनामों को विफल करने में सहयोग दिया। मुजफ्फरपुर के किसान काँग्रेस में सहयोग लिया। 1942 के आंदोलन में वे बड़े सक्रिय रहे। जयप्रकाश नारायण के संपर्क में आने से समाजवादी विचारों से ओतप्रोत हो एक हस्तलिखित पत्रिका का प्रकाशन किया। उनकी ही प्रेरणा से सोशालिस्ट पार्टी का कार्य किया। स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय होने के कारण अनेक बार उन्हें जेलों में जाना पड़ा। उन्होंने उसे कारावास न मान राजनीतिक तथा सामाजिक चेतना केंद्र के रूप में स्वीकार किया। नेपाल के कोइराला परिवार के घनिष्ठ संबंधों तथा कृष्णप्रसाद कोईराला के राजनीतिक जीवन से प्रभावित रेणु ने 1950 के नेपाल मुक्ति संग्राम में सशस्त्र सैनिक की भूमिका का निर्वाह करते हुए नेपाली काँग्रेस के प्रचार विभाग और आकाशवाणी संगठक के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे सक्रिय राजनीति से अलग हो गये।

 

इस प्रकार हम देखते हैं कि रेणु अपने राजनीतिक जीवन में लोभ से हमेशा दूर रहे उन्होंने राजनीति को व्यवसाय के रूप में नहीं स्वीकारा। केवल युग सत्य के रूप में राजनीति का स्वीकार किया।

 

फणीश्वरनाथ रेणु  का स्वभाव वैशिष्ट्य :

 

रेणु मूलत: रूमानी प्रकृति के व्यक्ति थे। उनके रहन-सहन में एक निरालापन था साजशृंगार करने में वे डेढ़-डेढ़ घंटा लगा देते थे। हमेशा साफ प्रेस किये हुए वस्त्र पहनते थे। बालों के प्रति उनकी विशेष रूचि थी।

 

उनके खान-पान में भी एक रईसी थी। इसमें उनकी अपनी एक रूचि और शौक थे। उन्हें सिगरेट पीना, शराब पीना-पिलाना आदि का शौक था। कोका-कोला उनका प्रिय पेय पदार्थ था।

 

उन्हें ईश्वर के प्रति बड़ी आस्था थी। रामकृष्ण परमहंस के जीवन तथा सिद्धांतों का उनपर बड़ा प्रभाव था। उनके प्रति अगाध श्रद्धा थी। माँ काली के प्रति रेणु का निश्चल समर्पण था । अन्य देवी देवताओं तथा काशीधाम पर उनकी श्रद्धा थी। गंगा के प्रति उन्हें बड़ा लगाव था। इसके साथ वे बड़े तांत्रिक थे। स्मशान साधना भी किया करते थे।

 

अत: धर्म पर इतनी आस्था होते हुए भी रेणु की धर्म विषयक विचारणा संकीर्णता के दायरे में आबद्ध नहीं रही।

 

रेणु का व्यक्तित्व अनेक गुणों से परिपूर्ण था। वे विनोदप्रिय थे। हाजिरजबाबी थे। रेणु में बुद्धि कौशल्य, साहसिकता तथा कर्मठता थी जिसका परिचय हम उनके राजनीतिक जीवन में प्राप्त करते हैं। वे हृदय से अत्यंत भावुक, निराभिमानी थे।

 

उन्हें अपने गाँव के प्रति बेहद लगाव था। एक बार शहर से गाँव जाने पर वापस आने का नाम नहीं लेते थे। उनका मन गाँव की मिट्टी में ऐसा घुलमिल जाता कि मिट्टी का एक एक कण उन्हें गाँव में रूकने को बाध्य करता।

 

इस तरह रेणु का व्यक्तित्व एक खुला हुआ व्यक्तित्व था। उनके व्यक्तित्त्व की यही विशेषता थी कि वह किसी एक छोर से बँधा हुआ नहीं था और न ही उन्हें कोई बांधने का सामर्थ्य रख सका। उनका व्यक्तित्व इतना विशाल था कि जिसमें मानव जीवन की नाना छबियों को सहजता से देखा जा सकता था। रेणुने लिखा है,

 

जीवन भर दुनिया की हर चीज और हर व्यक्ति में अपना प्रतिबिंब खोजता रहा, देखता रहा, मुग्ध होता रहा।'”4 अत: रेणु के व्यक्तित्व रूचि दर्पण में लोगों को अपना ही प्रतिबिंब दृष्टिगोचर होगा।

 फणीश्वरनाथ रेणु की मृत्यु 

हिंदी उपन्यास साहित्य को सही मायने में आँचलिकता की नई राह पर ले जानेवाले इस श्रेष्ठ साहित्यिक का 56 वर्ष की आयु में 11 अप्रैल 1977 में देहांत हो गया। अज्ञेयजी कहते हैं, “यश: शरीर और तेज: शरीर रेणु हमारे बीच और गहरे व्याप्त रहे हैं, नित्य हैं  

इस प्रकार यह श्रेष्ठ साहित्यिक मरकर भी अमर हो गया है।

 

फणीश्वरनाथ रेणु का कृतित्व :

 

प्रसिद्ध आचलिक साहित्यिक फणीश्वरनाथ रेणु ने साहित्य जगत में कविता के माध्यम से किया। लेकिन उनका कोई कविता संकलन प्रकाशित नहीं हुआ है और न ही उनकी कोई तत्कालिन बहुत प्रसिद्ध आखिल भारतीय स्तर की पत्रिका में कविताएँ प्रकाशित हुई हैं। यदि उनकी डायरी तथा बिहार और पटना के अन्य नगरों के क्षेत्रीय समाचारपत्रों, साहित्यिक पत्रिकाओं से प्राप्त कविताएँ 'आगा खाँ के राजमहल में’, ‘फागुनी हवा', ‘जागो मन के सजग पथिक हो', 'इमर्जेंसी', 'बहुरूपिया', 'सुंदरियों' आदि को देखें तो उन कविताओं के सहजता, सुबोधता तथा स्पष्टता से हम रेणु की श्रेष्ठता को जान जाते हैं। पर बिहार की साहित्यिक राजनीति ने उन्हें कवि के रूप में स्थापित नहीं होने दिया। इस प्रकार रेणु के कविताओं का लेखन तिथि के साथ संकलन न होने के कारण उनका सही मूल्यांकन नहीं हो सकता।

 

साहित्य जगत में रेणु का पदार्पण 'मैला आँचल' के प्रकाशनोपरांत माना जाता है परंतु रेणु ने कविता के माध्यम से साहित्य जगत में प्रवेश कर उसके बाद पाँचवे दशक से कहानीकार के रूप में अपने साहित्य लेखन का प्रारंभ किया।

 

रेणु को कहानी लेखन की प्रेरणा श्री. सतीनाथ भादुडी से मिली। 1953 में प्रकाशित 'बटबाबा' नामक उनकी प्रथम मानी जानेवाली कहानी 'विश्वमित्र' में प्रकाशित हुई। अत: रेणु की कहानियों की शुरूवात स्वतंत्रतापूर्व से प्रारंभ हो, लगभग 1970 तक उनका लेखन चलता रहा। रेणु लिखित कहानियों को स्थूल रूप से दो भागों में विभाजित कर सकते हैं एक आँचलिक कहानी और दूसरी अनांचलिक कहानी।