भारत में रामसर स्थल
अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों का संरक्षण
रामसर कन्वेंशन के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों के भारत के नेटवर्क का विस्तार वर्ष 2014 से अब तक लगभग चार गुना हो चुका है। नामित स्थलों की संख्या 26 से बढ़कर 103 तक पहुँच गई है, जो 13.87 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैले हुए हैं। एशिया में प्रथम और विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर स्थित ये इकोसिस्टम जैव विविधता के संरक्षण, बाढ़ के प्रभाव को कम करने, भूजल पुनर्भरण तथा आजीविका को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन ) नियम, 2017 के आधार पर भारत सरकार जलीय पारिस्थितिकी प्रणालियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय योजना (एनपीसीए), अमृत धरोहर, मिष्टी,और मिशन सहभागिता के माध्यम से वैज्ञानिक एवं जनभागीदारी आधारित संरक्षण को बढ़ावा दे रही है, ताकि दीर्घकालिक पारिस्थितिक सुदृढ़ता सुनिश्चित की जा सके।
भारत में रामसर स्थल — एक नज़र
रामसर कन्वेंशन के अनुसार, “आर्द्रभूमियाँ
दलदल, दलदली भूमि, पीटभूमि या जल
वाले ऐसे क्षेत्र हैं, चाहे वे
प्राकृतिक हों या कृत्रिम,
स्थायी हों या
अस्थायी, जिनमें स्थिर या
प्रवाहित, मीठा, खारा या लवणीय जल
पाया जाता है। इसमें समुद्री जल के वे क्षेत्र भी शामिल हैं, जहाँ निम्न ज्वार
के समय जल की गहराई छह मीटर से अधिक नहीं होती।” भूमि और जल को जोड़ने वाली आर्द्रभूमियाँ मीठे
जल का भंडारण करती हैं, भूजल का पुनर्भरण
करती हैं, बाढ़ के प्रभाव
को कम करती हैं तथा मत्स्य पालन और कृषि को बनाए रखती हैं। ये प्रवासी पक्षियों और
समृद्ध जैव विविधता को भी आश्रय प्रदान करती हैं, जिससे ये पृथ्वी के सर्वाधिक उत्पादक इकोसिस्टमों
में शामिल हैं।
वैश्विक स्तर पर इन
प्राकृतिक पर्यावासों का संरक्षण
आर्द्रभूमि कन्वेंशन अथवा रामसर कन्वेंशन नामक अंतर-सरकारी संधि के अंतर्गत किया
जाता है। इसे 2 फरवरी 1971 को ईरान के
रामसर शहर में स्वीकृत किया गया था और इसे वर्ष 1975 में लागू किया गया। अक्टूबर 2026 तक, इसमें 172 संविदाकारी पक्ष
शामिल हैं तथा इसके अंतर्गत विश्वभर में 2,536 से अधिक स्थल “रामसर स्थल” के रूप में नामित किए जा चुके हैं।
भारत, जहाँ बड़ी संख्या
में आर्द्रभूमियाँ मौजूद हैं, 1 फरवरी 1982 को इस कन्वेंशन का पक्षकार बना। तब से देश में रामसर
स्थलों के नेटवर्क का निरंतर विस्तार हुआ है। वर्तमान में भारत में 103 रामसर स्थल हैं, जो कि वर्ष 2014 में मात्र 26 स्थलों की तुलना
में लगभग चार गुना वृद्धि दर्शाते हैं। स्थलों की संख्या के आधार पर भारत का
नेटवर्क एशिया में प्रथम और विश्व में तीसरे स्थान पर है। कुल मिलाकर ये स्थल 28 राज्यों और
केंद्रशासित प्रदेशों में 13.87 लाख हेक्टेयर से
अधिक क्षेत्रफल में फैले हुए हैं।
रामसर स्थलों को समझना
रामसर स्थल ऐसी
आर्द्रभूमि होती है, जिसे रामसर
कन्वेंशन के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में नामित किया गया है।
इन स्थलों को उनके पारिस्थितिक, वनस्पति-विज्ञान संबंधी, प्राणी-विज्ञान संबंधी, लिम्नोलॉजिकल अथवा जलविज्ञान संबंधी महत्व के लिए मान्यता प्रदान की जाती है। रामसर
कन्वेंशन के तीन प्रमुख स्तंभ हैं। ये हैं—सभी आर्द्रभूमियों का विवेकपूर्ण उपयोग, रामसर स्थलों का
नामांकन एवं उनका प्रभावी प्रबंधन, तथा आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग।
किसी आर्द्रभूमि को कैसे
नामित किया जाता है
भारत में इस प्रक्रिया की
शुरुआत राज्य सरकार या केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन द्वारा उपयुक्त आर्द्रभूमि की
पहचान करने से होती है। इसके बाद, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय नामांकन के अनुमोदन की
प्रक्रिया का समन्वय करता है और प्रस्ताव को रामसर सचिवालय के पास भेजता है।
रामसर स्थल के रूप में घोषित किए जाने के मानदंड
किसी आर्द्रभूमि को अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में अर्हता प्राप्त करने के लिए निर्धारित नौ मानदंडों में से कम से कम एक को पूरा करना आवश्यक है। ये मानदंड दो समूहों में विभाजित हैं, जिनमें आर्द्रभूमि के प्रकार तथा जैव विविधता का संरक्षण शामिल हैं।
यदि इसमें संबंधित जैव-भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले किसी प्राकृतिक या लगभग प्राकृतिक आर्द्रभूमि प्रकार का प्रतिनिधि, दुर्लभ या अद्वितीय उदाहरण मौजूद हो।
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समूह |
मानदंड |
आर्द्रभूमि को अंतर्राष्ट्रीय महत्व की माना जाना चाहिए |
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समूह क: आर्द्रभूमि के प्रकार |
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मानदंड 1 |
यदि इसमें संबंधित जैव-भौगोलिक क्षेत्र में
पाए जाने वाले किसी प्राकृतिक या लगभग प्राकृतिक आर्द्रभूमि प्रकार का प्रतिनिधि, दुर्लभ या अद्वितीय उदाहरण
मौजूद हो। |
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समूह ख : जैव विविधता |
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प्रजातियों और पारिस्थितिक समुदायों पर आधारित मानदंड |
मानदंड 2 |
यदि यह असुरक्षित, संकटग्रस्त या अतिसंकटग्रस्त प्रजातियों अथवा संकटापन्न पारिस्थितिक
समुदायों को आश्रय प्रदान करती हो। |
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मानदंड 3 |
यदि यह किसी विशिष्ट जैव-भौगोलिक क्षेत्र की जैव विविधता
को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण पादप और/या जंतु प्रजातियों की आबादी को आश्रय
प्रदान करती हो। |
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मानदंड 4 |
यदि यह पादप और/या जंतु प्रजातियों को उनके जीवन-चक्र के
किसी महत्वपूर्ण चरण में आश्रय प्रदान करती हो अथवा प्रतिकूल
परिस्थितियों के दौरान उन्हें शरणस्थली उपलब्ध कराती हो। |
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जलपक्षियों पर आधारित विशिष्ट मानदंड |
मानदंड 5 |
यदि यह नियमित रूप से 20,000
या उससे अधिक जलपक्षियों को आश्रय प्रदान करती हो। |
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मानदंड 6 |
यदि यह किसी जलपक्षी प्रजाति या उसकी उप-प्रजाति की आबादी
के 1% को नियमित रूप से आश्रय प्रदान करती हो। |
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मछलियों पर आधारित विशिष्ट मानदंड |
मानदंड 7 |
यदि यह स्थानिक मछली उप-प्रजातियों, प्रजातियों या कुलों, जीवन-चक्र के विभिन्न चरणों, प्रजातियों के बीच
पारस्परिक संबंधों और/या ऐसी आबादियों के एक महत्वपूर्ण अनुपात को आश्रय प्रदान करती हो, जो आर्द्रभूमियों
से प्राप्त होने वाले लाभों और/या उनके महत्व को दर्शाती हो तथा इस प्रकार
वैश्विक जैव विविधता में योगदान देती हो। |
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मानदंड 8 |
यदि यह मछलियों के लिए भोजन का एक महत्वपूर्ण स्रोत, प्रजनन
स्थल, शिशु मछलियों के पालन-पोषण का क्षेत्र और/या प्रवास
मार्ग हो, जिस पर मछलियों के भंडार (चाहे आर्द्रभूमि के
भीतर हों या अन्यत्र) निर्भर करते हो। |
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अन्य टैक्सा या वर्गकों पर आधारित विशिष्ट मानदंड |
मानदंड 9 |
यदि यह आर्द्रभूमि पर निर्भर किसी गैर-पक्षी जंतु
प्रजातियों की एक प्रजाति या उसकी उप-प्रजाति की आबादी के 1% को नियमित रूप से आश्रय प्रदान
करती हो। |
क्या आप जानते हैं?
टैक्सॉन ऐसे जीवों का एक समूह है, जिन्हें उनकी समान विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, जबकि टैक्सा इसका बहुवचन रूप है, जो ऐसे अनेक समूहों को संदर्भित करता है। उदाहरण के लिए, गुलाब जैसे पुष्पीय पौधे पादप टैक्सॉन का हिस्सा हैं, जबकि तितलियाँ कीट टैक्सॉन के अंतर्गत आती हैं। जैव विविधता में उभयचर, सरीसृप और स्तनधारी प्रमुख जैविक वर्गीकरण समूहों के उदाहरण हैं।
आर्द्रभूमियों को रामसर सूची में शामिल करने के लाभ
रामसर सूची में
आर्द्रभूमियों को शामिल करना और रामसर कन्वेंशन के प्रति प्रतिबद्धताओं को पूरा
करना, जैव विविधता
संरक्षण के वैश्विक प्रयासों की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देना है। रामसर
स्थलों को न केवल किसी देश,
बल्कि संपूर्ण
मानवता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। रामसर स्थलों को नामित करने तथा उनका
संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
अंतर्राष्ट्रीय
प्रतिनिधित्व के लिए मंच प्रदान करता है: इससे देशों को आर्द्रभूमियों के संरक्षण
और विवेकपूर्ण उपयोग से संबंधित प्रमुख अंतर-सरकारी मंच पर अपनी चिंताएँ और विचार
प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। जिम्बाब्वे के विक्टोरिया फॉल्स में आयोजित रामसर
पक्षकारों के 15वें सम्मेलन में भारत ने ‘आर्द्रभूमियों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए सतत
जीवनशैली को बढ़ावा देना’
विषय पर एक
प्रस्ताव प्रस्तुत किया। सम्मेलन में इस प्रस्ताव को पारित किया गया। इसे रामसर
कन्वेंशन के 172 पक्षकारों, छह अंतर्राष्ट्रीय संगठन साझेदारों और अन्य पर्यवेक्षकों का
व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।
दृश्यता और पहचान बढ़ाता
है: इससे रामसर स्थलों की अंतर्राष्ट्रीय
स्तर पर दृश्यता और पहचान बढ़ती है, जिससे उनके संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग के लिए समर्थन
मजबूत हो सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय मानकों
और मार्गदर्शन तक पहुँच प्रदान करता है: अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों
की पहचान के लिए विश्व स्तर पर स्वीकृत मानकों से संबंधित नवीनतम जानकारी उपलब्ध
कराता है। साथ ही, आर्द्रभूमियों के
विवेकपूर्ण उपयोग और उनके प्रबंधन की योजना बनाने के लिए मार्गदर्शन भी प्रदान
करता है।
विशेषज्ञ सहायता प्राप्त
करने में सहायक होता है: इससे राष्ट्रीय और स्थल-विशिष्ट स्तर पर आर्द्रभूमियों के
संरक्षण एवं प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए विशेषज्ञ सलाह प्राप्त
करने का अवसर मिलता है। यह सहायता आवश्यकता के अनुसार, रामसर सचिवालय, उसके सहयोगियों
और रामसर सलाहकार मिशनों के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है।
अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और वित्तीय सहायता को बढ़ावा देता
है: आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबंधन
के लिए सहयोग को बढ़ावा देता है। साथ ही, कन्वेंशन की लघु-अनुदान योजनाओं तथा बहुपक्षीय और
द्विपक्षीय वित्तपोषण एजेंसियों के साथ संपर्क के माध्यम से परियोजनाओं के लिए
वित्तीय सहायता प्राप्त करने में भी मदद मिल सकती है।
नामांकन के बाद की प्रतिबद्धताएँ
नामांकन संबंधित राज्य या
केंद्रशासित प्रदेश सरकार को उस आर्द्रभूमि और उसके संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग
करने के लिए प्रतिबद्ध करता है। ऐसे स्थल को आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के अंतर्गत
अधिसूचित माना जाता है। साथ ही, दिशा-निर्देशों में एकीकृत प्रबंधन योजना के साथ इन नियमों
के तहत औपचारिक अधिसूचना जारी करने की भी सिफारिश की गई है।रामसर सूचना पत्रक को
प्रत्येक छह वर्ष में अद्यतन करना आवश्यक है तथा स्थल की पारिस्थितिक विशेषताओं की
नियमित निगरानी की जानी चाहिए। इन मानदंडों और प्रतिबद्धताओं के मार्गदर्शन के लिए
भारत ने रामसर स्थलों का व्यापक और उल्लेखनीय रूप से विविधतापूर्ण नेटवर्क विकसित
किया है।
भारत के रामसर स्थल — 26 से 103 तक
भारत के रामसर स्थल ऊँचाई
पर स्थित झीलों, नदी के बाढ़
मैदानों, मैंग्रोव वनों, प्रवाल भित्तियों, गाँवों के
तालाबों और शहरी दलदली क्षेत्रों तक फैले हैं। तमिलनाडु में सर्वाधिक 20 स्थल हैं, जबकि उत्तर
प्रदेश 14 स्थलों के साथ
दूसरे स्थान पर है। इन स्थलों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, अकेले वर्ष 2025 में 11 आर्द्रभूमियों
को रामसर सूची में शामिल किया गया, जिससे देश में इनकी कुल संख्या 96 हो गई। उत्तर
प्रदेश स्थित सुरहा ताल जून 2026 में भारत का 100वाँ स्थल, जबकि अगस्त में ग्लॉ झील को 101वें स्थल के रूप में शामिल किया गया। चंडीगढ़
की सुखना आर्द्रभूमि और उत्तर प्रदेश की सौज झील को सूची में नवीनतम स्थलों के रूप में शामिल किए
जाने के साथ ही 15अक्टूबर 2026 तक, भारत में रामसर
स्थलों की कुल संख्या बढ़कर 103 हो गई।
भारत के प्रथम रामसर स्थल
ओडिशा की चिल्का झील और राजस्थान के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को 1 अक्टूबर 1981 को भारत के प्रथम रामसर स्थलों के रूप में नामित किया गया था। सफल पारिस्थितिक पुनर्स्थापन के बाद, चिल्का झील को वर्ष 2002 में मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड से हटा दिया गया। बाद में, चिल्का विकास प्राधिकरण को रामसर आर्द्रभूमि संरक्षण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड क्या
है:मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड रामसर स्थलों का एक ऐसा रजिस्टर है, जिसमें उन स्थलों
को शामिल किया जाता है, जहाँ पारिस्थितिक
विशेषताओं में परिवर्तन हो चुका है, हो रहा है या होने की आशंका है। यह उन आर्द्रभूमियों की
पहचान करता है, जिन्हें संरक्षण
के लिए प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता है, तथा उनकी निगरानी, सुधारात्मक उपायों और संसाधनों के आवंटन के लिए मार्गदर्शन
प्रदान करता है। किसी स्थल को संबंधित देश और प्रासंगिक वैज्ञानिक विशेषज्ञों के
परामर्श से इस रिकॉर्ड में शामिल किया जाता है। सफल सुधारात्मक उपायों का
दस्तावेजीकरण हो जाने या पारिस्थितिक परिवर्तन का खतरा समाप्त हो जाने पर उस स्थल
को मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड से हटाया जा सकता है।
भारत की रामसर स्थलों की सूची में हाल ही में शामिल किए गए स्थल
सुखना आर्द्रभूमि
(चंडीगढ़) शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में
वर्ष 1958 में बनाया गया
एक मानव-निर्मित जलाशय है। यह पलास फिश
ईगल, कॉमन पोचार्ड और
ब्लैक पोंड टर्टल जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों को आश्रय प्रदान करता है। मध्य
एशियाई फ्लाईवे से होकर आने वाले प्रवासी पक्षी भोजन प्राप्त करने और शीतकाल
बिताने के लिए इस आर्द्रभूमि पर निर्भर रहते हैं।
सौज झील (उत्तर प्रदेश) मैनपुरी जिले में स्थित बाढ़ के मैदान की एक उथली झील है, जहाँ 30,000 से अधिक जलीय पक्षी नियमित रूप से आते हैं। यह सारस और वृहद चित्तीदार चील जैसी लुप्तप्राय पक्षी प्रजातियों को घोंसले बनाने तथा भोजन की तलाश करने के लिए उपयुक्त आवास प्रदान करती है। इसके पवित्र कमल और जंगली गन्ने के घने क्षेत्र घोंसले बनाने वाले पक्षियों, मछलियों और उभयचरों को आश्रय प्रदान करते हैं।
रामसर स्थलों की राज्यवार सूची
नीचे दी गई तालिका में राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के अनुसार सभी 103 रामसर स्थलों तथा उनके प्रमुख संरक्षण महत्व का उल्लेख किया गया है।
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राज्य /केंद्रशासित प्रदेश |
रामसर स्थल |
इसकी क्या विशेषता है |
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आंध्र
प्रदेश |
कोलेरू झील |
मीठे पानी की झील; ग्रे पेलिकन और प्रवासी
जलपक्षी |
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2.
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अरुणाचल
प्रदेश |
ग्लॉ झील |
पूर्वी हिमालयी झील; 150 से अधिक वृक्ष और
ऑर्किड की 49 प्रजातियाँ। |
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3.
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असम |
दीपोर बील |
ब्रह्मपुत्र की बाढ़भूमि वाला
आर्द्रभूमि क्षेत्र; प्रवासी जलपक्षी |
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4.
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बिहार |
कंवर झील (काबरताल) |
बाढ़भूमि आर्द्रभूमि; प्रवासी जलपक्षी और मछलियाँ |
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5.
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नागी पक्षी अभयारण्य |
मानव निर्मित जलाशय; शीतकाल में आने वाले जलपक्षी |
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6.
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नकटी पक्षी अभयारण्य |
मानव निर्मित जलाशय; शीतकाल में आने वाले जलपक्षी |
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7.
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गोकुल जलाशय |
गंगा की विसर्प झील; पक्षी, मत्स्य पालन और बाढ़ के प्रभाव को कम करने में सहायक |
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8.
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उदयपुर झील |
विसर्प झील; शीतकाल में प्रवासी जलपक्षी |
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9.
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गोगाबिल झील |
विसर्प झील; स्थानीय एवं प्रवासी पक्षी |
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10.
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चंडीगढ़ |
सुखना आर्द्रभूमि |
वर्षाजल पर निर्भर, शहरी परिधि में स्थित जलाशय; प्रवासी एवं स्थानीय पक्षी |
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11.
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छत्तीसगढ़ |
कोपरा जलाशय |
जलाशय; स्थानीय एवं प्रवासी जलपक्षी |
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12.
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गोवा |
नंदा झील |
प्राकृतिक मीठे पानी की झील; शीतकालीन
प्रवासी जलपक्षी |
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13.
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गुजरात |
नलसरोवर |
प्राकृतिक मीठे पानी की झील; सारस एवं अन्य जलपक्षी |
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14.
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वधवाना आर्द्रभूमि |
सिंचाई जलाशय; शीतकालीन प्रवासी पक्षी |
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15.
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थोल झील वन्यजीव अभयारण्य |
मानव निर्मित जलाशय; सारस सहित जलपक्षी |
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16.
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खिजड़िया वन्यजीव अभयारण्य |
कच्छ की खाड़ी के निकट तटीय मीठे पानी एवं
लवणीय दलदली आर्द्रभूमि; विविध प्रकार के पक्षी। |
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17.
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छारी ढांड |
बन्नी के निकट मौसमी मरुस्थलीय आर्द्रभूमि; सारस एवं फ्लेमिंगो |
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18.
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हरियाणा |
सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान |
स्थानीय एवं प्रवासी जलपक्षी |
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19.
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भिंडावास वन्यजीव अभयारण्य |
मानव निर्मित मीठे पानी की आर्द्रभूमि; प्रवासी पक्षी |
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20.
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हिमाचल
प्रदेश |
पोंग बाँध झील |
ब्यास जलाशय; शीतकालीन जलपक्षी |
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21.
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चंद्रताल आर्द्रभूमि |
उच्च हिमालयी झील; हिम तेंदुए का आवास |
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22.
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रेणुका आर्द्रभूमि |
झरनों से पोषित झील; जलीय एवं वन जैव विविधता |
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23.
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झारखंड |
उधवा झील पक्षी अभयारण्य |
गंगा से जुड़ी जुड़वाँ झीलें; प्रवासी एवं स्थानीय जलपक्षी |
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24.
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कर्नाटक |
रंगनाथिट्टू पक्षी अभयारण्य |
कावेरी नदी के द्वीप; घोंसले बनाने वाले जलपक्षी एवं मगर |
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25.
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अघनाशिनी मुहाना |
ज्वारनदमुख एवं मैंग्रोव वन; मत्स्य पालन |
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26.
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मगड़ी केरे संरक्षण रिज़र्व |
मानव निर्मित तालाब; शीतकालीन बार-हेडेड गूज |
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27.
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अंकसमुद्र पक्षी संरक्षण रिज़र्व |
गाँव का सिंचाई तालाब; घोंसले बनाने वाले जलपक्षी |
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28.
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केरल |
अष्टमुडी आर्द्रभूमि |
ज्वारनदमुखीय पश्चजल क्षेत्र; मत्स्य पालन एवं मैंग्रोव वन |
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29.
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सस्थमकोट्टा झील |
झरनों से पोषित मीठे पानी की झील; पेयजल का स्रोत |
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30.
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वेम्बनाड-कोल आर्द्रभूमि |
दक्षिण-पश्चिमी तट पर सबसे बड़ी खारी
आर्द्रभूमि |
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31.
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मध्य प्रदेश |
भोज आर्द्रभूमियाँ |
भोपाल की ऊपरी एवं निचली झीलें; जलापूर्ति एवं पक्षी |
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32.
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सिरपुर आर्द्रभूमि |
इंदौर में स्थित मानवनिर्मित
आर्द्रभूमि; प्रवासी पक्षी |
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33.
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साख्य सागर |
माधव राष्ट्रीय उद्यान में स्थित जलाशय; मगर |
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34.
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यशवंत सागर |
इंदौर के निकट जलाशय; सारस एवं जलापूर्ति |
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35.
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तवा जलाशय |
सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व में स्थित जलाशय; जलीय जीव-जंतु एवं पक्षी जीवन |
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36.
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महाराष्ट्र |
नांदूर मध्यमेश्वर |
पक्षी अभयारण्य; प्रवासी जलपक्षी |
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37.
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लोनार झील |
उल्कापिंड के प्रभाव से बनी क्रेटर झील; लवणीय-क्षारीय इकोसिस्टम |
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38.
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ठाणे क्रीक |
मैंग्रोव वन; फ्लेमिंगो एवं प्रवासी पक्षी |
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39.
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मणिपुर |
लोकटक झील |
तैरते हुए फुमदी द्वीप; संगाई हिरण का आवास |
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40.
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मिजोरम |
पाला आर्द्रभूमि |
मिजोरम की सबसे बड़ी प्राकृतिक आर्द्रभूमि; हूलॉक गिब्बन |
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41.
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ओडिशा |
चिल्का झील |
खारे पानी की लैगून; इरावदी डॉल्फ़िन, जलपक्षी एवं मछलियों की 118 प्रजातियाँ |
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42.
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भीतरकनिका मैंग्रोव |
मैंग्रोव वन; खारे पानी का मगरमच्छ एवं ऑलिव रिडले कछुआ |
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43.
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सतकोसिया गॉर्ज |
महानदी का नदीय गॉर्ज; घड़ियाल एवं मगर |
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44.
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ताम्परा झील |
मीठे पानी की झील; मछलियाँ एवं जलपक्षी |
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45.
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हीराकुंड जलाशय |
विशाल जलाशय; मछलियाँ एवं जलपक्षी |
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46.
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अंसुपा झील |
महानदी की विसर्प झील; पक्षी एवं मछलियाँ |
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47.
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पंजाब |
हरिके झील |
नदी संगम पर स्थित जलाशय; प्रवासी जलपक्षी |
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48.
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कांजली झील |
काली बेईं पर बैराज से निर्मित आर्द्रभूमि; जलपक्षी |
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49.
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रोपड़ झील |
सतलुज बैराज जलाशय; जलपक्षी |
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50.
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ब्यास संरक्षण रिज़र्व |
नदी का विस्तार; सिंधु नदी डॉल्फ़िन एवं घड़ियाल |
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51.
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केशोपुर-मियानी सामुदायिक रिजर्व |
सामुदायिक प्रबंधन वाली आर्द्रभूमि; जलपक्षी |
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52.
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नंगल वन्यजीव अभयारण्य |
शिवालिक की तलहटी में स्थित जलाशय; जलपक्षी |
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53.
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राजस्थान |
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान |
जलपक्षी; साइबेरियन क्रेन का ऐतिहासिक शीतकालीन प्रवास स्थल |
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54.
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सांभर झील |
विशाल अंतर्देशीय लवणीय झील; फ्लेमिंगो |
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55.
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मेनार आर्द्रभूमि परिसर |
समुदाय द्वारा संरक्षित ग्राम्य आर्द्रभूमियाँ; प्रवासी पक्षी |
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56.
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खीचन आर्द्रभूमि |
शीतकाल में आने वाले डेमोइसेल क्रेन; सामुदायिक संरक्षण |
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57.
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सिलीसेढ़ झील |
अलवर के निकट जलाशय; आर्द्रभूमि जैव विविधता |
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58.
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सिक्किम |
खेचेओपलरी आर्द्रभूमि |
पटलभूमि एवं वन से युक्त पवित्र हिमालयी झील |
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59.
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तमिलनाडु |
पॉइंट कैलिमेरे वाइल्डलाइफ़ और बर्ड
सैंक्चुअरी |
तटीय आर्द्रभूमि; फ्लेमिंगो एवं प्रवासी तटीय पक्षी |
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60.
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कूनथनकुलम पक्षी अभयारण्य |
दक्षिण भारत का सबसे बड़ा जलपक्षी प्रजनन अभयारण्य |
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61.
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चित्रांगुडी पक्षी अभयारण्य |
जलपक्षियों का प्रजनन एवं शीतकालीन प्रवास स्थल |
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62.
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कारिकिली पक्षी अभयारण्य |
प्रजनन करने वाले जलपक्षी |
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63.
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पिचावरम मैंग्रोव |
भारत के सबसे बड़े मैंग्रोव वनों में से एक; मछलियों की नर्सरी |
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64.
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पल्लिकरणई दलदलीय आरक्षित वन |
शहरी दलदल; बाढ़ बफर और पक्षी |
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65.
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मन्नार की खाड़ी समुद्री जैवमंडल आरक्षित
क्षेत्र |
प्रवाल भित्तियाँ एवं डुगोंग |
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66.
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वेंबन्नूर आर्द्रभूमि परिसर |
मानव निर्मित सिंचाई तालाब; जलपक्षी |
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67.
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वेलोडे पक्षी अभयारण्य |
जलपक्षी |
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68.
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उधयमार्थंदपुरम पक्षी अभयारण्य |
प्रवासी जलपक्षी |
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69.
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वेदांथंगल पक्षी अभयारण्य |
भारत के सबसे पुराने पक्षी संरक्षित क्षेत्रों में से एक; बगुलों का प्रजनन स्थल |
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70.
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सुचिंद्रम थेरूर आर्द्रभूमि परिसर |
सिंचाई तालाब; प्रवासी पक्षी |
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71.
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वडुवुर पक्षी अभयारण्य |
शीतकालीन जलपक्षी |
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72.
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कंजीरनकुलम पक्षी अभयारण्य |
घोंसले बनाने वाले बगुले एवं चित्रित सारस |
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73.
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करैवेट्टी पक्षी अभयारण्य |
विशाल अंतर्देशीय मीठे पानी की झील; घोंसले बनाने वाले जलपक्षी |
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74.
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लॉन्गवुड शोला आरक्षित वन |
नीलगिरि के शोला वन; स्थानिक पक्षी |
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75.
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कझुवेली पक्षी अभयारण्य |
खारे पानी की तटीय झील; प्रवासी पक्षी |
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76.
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नंजयरायन पक्षी अभयारण्य |
झील; स्थानीय एवं प्रवासी पक्षी |
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77.
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सक्करकोट्टई पक्षी अभयारण्य |
प्रवासी जलपक्षी |
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78.
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थेरथंगल पक्षी अभयारण्य |
घोंसले बनाने वाले जलपक्षी |
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79.
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त्रिपुरा |
रुद्रसागर झील |
जलाशयी झील; मछलियाँ एवं थ्री सट्राइप्ड
रूफ टर्टल |
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80.
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उत्तर प्रदेश |
ऊपरी गंगा नदी (बृजघाट से नरौरा) |
गंगा नदी की डॉल्फ़िन, घड़ियाल एवं कछुए |
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81.
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नवाबगंज पक्षी अभ्यारण्य |
प्रवासी जलपक्षी |
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82.
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सरसई नवार झील |
सारस का आवास |
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83.
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सांडी पक्षी अभ्यारण्य |
मीठे पानी का दलदली क्षेत्र; जलपक्षी एवं सारस |
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84.
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समसपुर पक्षी अभयारण्य |
जलपक्षी |
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85.
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पार्वती अर्गा पक्षी अभयारण्य |
जुड़वाँ विसर्प
झीलें; जलपक्षी एवं गिद्ध |
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86.
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समन पक्षी अभयारण्य |
विसर्प झील; शीतकालीन जलपक्षी |
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87.
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सुर सरोवर |
आगरा के निकट मानव
निर्मित जलाशय; जलपक्षी |
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88.
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हैदरपुर आर्द्रभूमि |
गंगा की बाढ़भूमि; घड़ियाल,
दलदली हिरण एवं जलपक्षी |
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89.
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बखिरा वन्यजीव अभयारण्य |
पूर्वी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी प्राकृतिक बाढ़भूमि आर्द्रभूमि |
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90.
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पटना पक्षी अभ्यारण्य |
जलपक्षी |
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91.
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शेखा झील पक्षी अभ्यारण्य |
शीतकाल में आने वाले बार-हेडेड गूज एवं चित्रित सारस |
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92.
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जय प्रकाश नारायण पक्षी अभ्यारण्य (सुरहा
ताल) |
समृद्ध पक्षी विविधता; प्रवासी एवं स्थानीय पक्षी |
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93.
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सौज झील |
उथली, बारहमासी बाढ़भूमि आर्द्रभूमि; प्रवासी एवं स्थानीय जलपक्षी |
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94.
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उत्तराखंड |
आसन संरक्षण रिज़र्व |
आसन यमुना संगम; प्रवासी जलपक्षी |
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95.
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पश्चिम बंगाल |
पूर्वी कोलकाता आर्द्रभूमियाँ |
अपशिष्ट जल पर आधारित मत्स्य पालन एवं कृषि |
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96.
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सुंदरबन आर्द्रभूमि |
मैंग्रोव वन; रॉयल बंगाल टाइगर |
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97.
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जम्मू - कश्मीर (केंद्र शासित प्रदेश) |
वुलर झील |
मीठे पानी की विशाल झील; मत्स्य पालन |
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98.
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सुरिनसर मानसर झीलें |
मीठे पानी की जुड़वाँ झीलें |
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99.
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होकेरा आर्द्रभूमि |
नरकुल के झुरमुट; सफेद आंखों वाला पोचार्ड |
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100.
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हाइगम आर्द्रभूमि संरक्षण रिज़र्व |
बाढ़ के जल को अवशोषित करने वाला बेसिन; जलपक्षी |
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101.
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शालबुग आर्द्रभूमि संरक्षण रिज़र्व |
जलपक्षी |
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102.
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लद्दाख (केंद्र शासित प्रदेश) |
त्सोमोरिरी |
ऊंचाई वाली झील; काली गर्दन वाला क्रेन और बार-हेडेड गूज़ |
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103.
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त्सो कार आर्द्रभूमि परिसर |
ऊंचाई वाली झीलें; काली गर्दन वाले क्रेन का प्रजनन |
रामसर स्थल संरक्षण में किस प्रकार सहायक होते हैं
रामसर का दर्जा प्राप्त
होने से नामित आर्द्रभूमियों को वैश्विक पहचान, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और विशेषज्ञों की सलाह प्राप्त करने
का अवसर मिलता है। इसके साथ ही, प्रत्येक स्थल की पारिस्थितिक विशेषताओं के संरक्षण के लिए
उचित योजना बनाने और नियमित निगरानी करने की स्पष्ट जिम्मेदारी भी राज्यों पर आती
है।
इकोसिस्टमों का पुनर्स्थापन:
चिल्का झील इसका उदाहरण है कि निरंतर
पुनर्स्थापन के प्रयास किस प्रकार किसी आर्द्रभूमि और उस पर निर्भर समुदायों को
पुनर्जीवित कर सकते हैं। वर्तमान में यह लैगून मछलियों की 118 प्रजातियों को
आश्रय प्रदान करता है तथा जलीय पक्षियों के प्रजनन, शीतकालीन प्रवास और प्रवास के दौरान विश्राम का
महत्वपूर्ण स्थल है।
आजीविका को बनाए रखना: पूर्वी कोलकाता
आर्द्रभूमि लगभग 4,000 हेक्टेयर
क्षेत्र में फैले मछली के तालाबों के माध्यम से शहर के अपशिष्ट जल का प्राकृतिक
रूप से शोधन करती है। यहाँ प्रतिवर्ष लगभग 10,500 टन मछली का उत्पादन होता है और लगभग 50,000 लोगों को सीधे
तौर पर सहायता देते हैं।
जलवायु परिवर्तन के प्रति
अनुकूलन क्षमता बढ़ाना: सुंदरबन के मैंग्रोव वन अंतर्देशीय क्षेत्रों को तूफानों, चक्रवातों, ज्वारीय लहरों और
खारे पानी के प्रवेश से बचाते हैं। ये मछलियों और घोंघो जैसे जलीय जीवों के प्रजनन
एवं पोषण स्थल के रूप में भी कार्य करते हैं, जिससे भारत के संपूर्ण पूर्वी तट पर मत्स्य संसाधनों को
बनाए रखने में सहायता मिलती है।
लुप्तप्राय प्रजातियों का पुनरुद्धार: पंजाब के
ब्यास संरक्षण रिज़र्व में भारत की लुप्तप्राय सिंधु नदी डॉल्फ़िन की एकमात्र
ज्ञात आबादी है। वर्ष 2017 में शुरू किए गए
पुनर्स्थापन कार्यक्रम के अंतर्गत 47 घड़ियालों को नदी में छोड़ा गया, जो लगभग तीन
दशकों बाद इस नदी में उनकी वापसी का प्रतीक था। नदी का यह 185 किलोमीटर लंबा
हिस्सा 500 से अधिक पक्षी
प्रजातियों और 90 से अधिक मछली
प्रजातियों को भी आश्रय प्रदान करता है।
समुदाय की सक्रिय भागीदारी: राजस्थान की खीचन
आर्द्रभूमि मात्र 54 हेक्टेयर
क्षेत्र में प्रतिवर्ष 22,000 से अधिक प्रवासी
डेमोइसेल सारसों को आश्रय प्रदान करती है। समीपवर्ती गाँव के निवासी इन पक्षियों
को बिजली की तारों से टकराने और आवारा कुत्तों के हमलों से बचाने के लिए सक्रिय
रूप से कार्य करते हैं।
आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए सरकारी पहलें
भारत के रामसर स्थलों के
नेटवर्क को कानूनों, योजनाओं और
जनभागीदारी पर आधारित एक सुदृढ़ ढाँचे का समर्थन प्राप्त है।
आर्द्रभूमि (संरक्षण और
प्रबंधन) नियम, 2017
पर्यावरण (संरक्षण)
अधिनियम, 1986 के अंतर्गत
अधिसूचित ये नियम आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए नियामक ढाँचा प्रदान करते हैं।
इनके तहत राज्य/केंद्रशासित प्रदेश आर्द्रभूमि प्राधिकरणों की स्थापना की जाती है
तथा अतिक्रमण, कचरा डालने और
बिना उपचारित अपशिष्ट जल के निर्वहन जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जाता है।
जलीय इकोसिस्टमों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय
योजना (एनपीसीए)
एनपीसीए के अंतर्गत झीलों
और आर्द्रभूमियों के संरक्षण से संबंधित राष्ट्रीय कार्यक्रमों को एक ही योजना में
समाहित किया गया। वर्ष 2024 में जारी अद्यतन
एनपीसीए दिशानिर्देश राज्यों को आर्द्रभूमियों के प्रबंधन के लिए एकीकृत और
वैज्ञानिक ढाँचा प्रदान करते हैं।
अमृत धरोहर
अमृत धरोहर भारत के रामसर
स्थलों के विशिष्ट संरक्षण मूल्यों को बढ़ावा देती है। इसके प्रमुख क्षेत्रों में
प्रजातियों एवं आवासों का संरक्षण, प्रकृति- पर्यटन, आर्द्रभूमियों पर निर्भर आजीविका और आर्द्रभूमियों में
कार्बन का आकलन शामिल हैं। इस पहल के अंतर्गत, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण
द्वारा क्रमशः 75 रामसर स्थलों की
वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की सूची तैयार करने के लिए अध्ययन किए गए हैं। इसके
अतिरिक्त, ‘आर्द्रभूमियों
में कार्बन भंडार के आकलन के लिए मानक संचालन प्रक्रिया’ जारी की गई। इसका
उपयोग देशभर के 39 रामसर स्थलों
में कार्बन भंडार का आकलन करने के लिए किया गया है।
मिशन सहभागिता और आर्द्रभूमि बचाओ अभियान
मिशन सहभागिता
आर्द्रभूमियों के संरक्षण में जनभागीदारी को प्रोत्साहित करता है। इसका ‘आर्द्रभूमि बचाओ
अभियान’ 4 फरवरी 2023 को गोवा में
शुरू किया गया था। इसके बाद से 20 लाख से अधिक नागरिक स्वयंसेवकों ने देशभर में 1.7 लाख से अधिक
आर्द्रभूमियों का मानचित्रण करने में योगदान दिया है।
तटीय आवासों और ठोस आय के लिए मैंग्रोव पहल (मिष्टी)
मिष्टी का लक्ष्य नौ
राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों में 540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मैंग्रोव वनों का पुनर्स्थापन
करना है। अब तक, क्षरित मैंग्रोव
वनों के 9,949.5 हेक्टेयर
क्षेत्र के पुनर्स्थापन के लिए 88.44 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।
भारत के वेटलैंड्स पोर्टल
2 अक्टूबर 2021 को शुरू किया गया यह पोर्टल भारत की आर्द्रभूमियों से
संबंधित एक गतिशील ज्ञान भंडार के रूप में कार्य करता है। यह आर्द्रभूमि स्थलों, परियोजनाओं, पहलों और
प्रशिक्षण से जुड़ी जानकारी तक प्रबंधकों तथा नागरिकों को एक ही स्थान पर पहुँच
प्रदान करता है।
आर्द्रभूमि शहर प्रत्यायन
जनवरी 2025 में इंदौर और
उदयपुर भारत के पहले ऐसे शहर बने जिन्हें रामसर के अंतर्गत आर्द्रभूमि शहर प्रत्यायन प्राप्त हुआ। इसके साथ ही वे रामसर
प्रत्यायित आर्द्रभूमि शहरों के वैश्विक नेटवर्क में शामिल हो गए।
आगे की राह
भारत में रामसर स्थलों के
विस्तारित होते नेटवर्क से वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रभावी प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी के
माध्यम से आर्द्रभूमि संरक्षण को सुदृढ़ करने का अवसर मिलता है। भविष्य में मुख्य
रूप से अंतर्राष्ट्रीय मान्यता को
दीर्घकालिक पारिस्थितिक परिणामों में बदलने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
नियमित निगरानी, साक्ष्य-
आधारित योजना बनाने तथा सरकारों, संस्थानों और
स्थानीय समुदायों के बीच समन्वय से इन आर्द्रभूमियों की पारिस्थितिक विशेषताओं को
बनाए रखने में मदद मिल सकती है। यह सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक
होंगे कि आर्द्रभूमियाँ भावी पीढ़ियों के लिए जैव विविधता, जल सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन
के प्रति अनुकूलन क्षमता और आजीविका को सहारा देती रहें।
इसी प्रकार, आर्द्रभूमि संरक्षण को व्यापक विकास योजनाओं में एकीकृत करना भी महत्वपूर्ण है। स्थानीय स्तर पर संरक्षण की जिम्मेदारी को मजबूत करना, आँकड़ों एवं ज्ञान के आदान-प्रदान में सुधार करना तथा सतत आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देना संरक्षण प्रयासों को और प्रभावी बना सकता है। पारिस्थितिक प्राथमिकताओं को समुदायों की आवश्यकताओं के साथ जोड़कर भारत आर्द्रभूमि प्रबंधन के लिए अधिक समावेशी और सुदृढ़ दृष्टिकोण विकसित कर सकता है, जिससे ये इकोसिस्टम दीर्घकाल तक उत्पादक बने रहें और उनका संरक्षण सुनिश्चित हो सके।
