कर्मण्ये वाधिकारस्ते का हिन्दी अर्थ एवं व्याख्या |निष्काम कर्म की व्याख्या |Karmanye vadhikaraste Hindi Meaning - Daily Hindi Paper | RPSC Online GK in Hindi | GK in Hindi l RPSC Notes in Hindi

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सोमवार, 27 सितंबर 2021

कर्मण्ये वाधिकारस्ते का हिन्दी अर्थ एवं व्याख्या |निष्काम कर्म की व्याख्या |Karmanye vadhikaraste Hindi Meaning

कर्मण्ये वाधिकारस्ते का हिन्दी अर्थ एवं व्याख्या , निष्काम कर्म की व्याख्या 

कर्मण्ये वाधिकारस्ते का हिन्दी अर्थ एवं व्याख्या , निष्काम कर्म की व्याख्या



गीता के द्वितीय अध्याय के 47 श्लोक में निष्काम कर्म की व्याख्या करते हुये भगवान श्री कृष्ण ने कहा है

 

कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । 

मा कर्म फलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ।।

 

अर्थात् - 

" तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलो में कभी नहीं इसलिये तुम कर्मों के फल का हेतु मत बन तथा कर्म न करने में भी तेरी आसक्ति न होवे"



कर्मण्ये वाधिकारस्ते की  व्याख्या 

यहां निष्काम कर्म के बन्धन में एक स्वाभाविक प्रश्न मन में उठता है कि कोई भी मुर्ख व्यक्ति भी किसी प्रयोजन के बिना कार्य में प्रवृत्त नहीं होते है - 


प्रयोजनमनूदिश्य मन्दोंऽपि न प्रवर्तते" 


इस न्याय के अनुसार निष्काम कर्म तो असम्भव है। क्योंकि यदि कोई कामना ही नहीं होगी तो हम कर्म क्यों करे ? क्योंकि कर्तापन और आसक्ति, निष्काम कर्म के दो अंग बताये गये है इन दोनों का अभाव असम्भव है अतः निष्काम कर्म भी असम्भव है। इस समस्या का समाधान करते हुये स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है

 

प्रकृते क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । 

अहंकार विमूढ़ात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ।। ( 3 / 26 )

 

अर्थात् कर्तापन का अभाव तभी सम्भव है, जब व्यक्ति यह भलि-भांति समझ ले कि इसका कर्ता मैं नहीं हूँ कर्म तो प्रकृति की गुणों द्वारा किये जाते हैं। अतः जो ज्ञानी व्यक्ति है वह यह जानता है कि सभी कर्म प्रकृति जनित गुणो द्वारा ही किया जाता है अर्थात् समस्त मनुष्य प्रकृत जनित गुणों द्वारा परवश होकर कर्म करने के लिये बाध्य होता है— 

"कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैगुणै: " (गीता 3 / 5 ) । 


इसलिये जो ज्ञानी मनुष्य होता है वह यह जानता है कि जो कर्ता कर्म का अभिमान वह केवल अज्ञानता के कारण है। इस प्रकार निष्काम कर्म ही वास्तविक कर्म योग है। 


निष्काम कर्म की व्याख्या गीता में निष्काम कर्म का उद्देश्य 


गीता में निष्काम कर्म का उद्देश्य दो रूपों में बताया गया है- 

(1) आत्मशुद्धि और

 (2) ईश्वर के प्रयोजन को पूरा करना ।


पहला कर्म केवल योगी करता है। अपने समूह के लिये जिसका वह अंग होता है लेकिन दूसरे के अनुसार ईश्वर के लिए कर्म किया जाता है और जिसका फल ईश्वर को अर्पित किया जाता है। परस्पर एक दूसरे के प्रति कर्तव्य का बोध है। और दूसरे में लोक की सेवा वह ईश्वर के लिए करता है परन्तु ध्यान देने की बात यह है कि कर्म चाहे कर्तव्य के लिये किया जाय या ईश्वर सेवा के लिए वह


सम्पूर्ण अर्थों में निष्काम नहीं कहा जा सकता है। गीता में भी निष्काम का अर्थ लक्ष्यविहीनता न होकर कर्म फल के प्रति आसक्ति से विरत होने में है।


गीता अपने सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों अर्थों में लक्ष्य विहीन न होकर निष्काम कर्म योग का अनुपालन करती है। इस लिये श्री कृष्ण अर्जुन को अपने दायित्व निर्वाह करने का तथा सामाजिक दायित्व के रूप में स्वधर्म पालन करने का तथा निष्काम कर्म योगी बनने का उपदेश देते हैं। 


निष्काम कर्मयोगी कौन है 


निष्काम कर्मयोगी के विषय में गीता में कहा गया है कि जो कर्म योगी अपने स्वधर्म का पालन निष्काम या अनासक्त भाव से करता है वह सांसारिक भव बन्धन से मुक्त हो जाता हैं। इस प्रकार गीता के 'ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त हो जाता है। 


गीता के निष्काम कर्म का उपदेश कर्तव्य के लिये कर्तव्य करने जैसा है। (Duty for Duty) व्यक्ति की श्रेष्ठता फल प्राप्ति में नहीं है बल्कि फल त्याग में है, कर्म करने की कुशलता भी योग है— 'योगः कर्मसु कौशलम्' वर्ण व्यवस्था के किसी भी वर्ण का शूद्र व्यक्ति क्यों न हों यदि वह स्वधर्म का पालन कर्तव्य निष्ठ भाव से करता है तो वही स्थिति वह भी प्राप्त करेगा। जिस स्थिति को ब्राह्मण प्राप्त करता है। क्योंकि वर्ण व्यवस्था का निर्धारण व्यक्ति के गुण और कर्म के अनुसार ही है- "चार्तुवर्णयं मया सृष्टम गुणः कर्म विभागशः" इस प्रकार निष्काम रूप में कह सकते है कि गीता कर्मयोग नैषकर्म्य या कर्म निषेध नहीं है किन्तु कामना का त्याग है, अर्थात् कामना के त्याग से तात्पर्य कर्म फल के त्याग से है। 



गीता 18/2 में कहा गया है 

"काम्यानाम कर्मणा न्यासं सन्यासं कवयो विदुः"


इस प्रकार निष्काम कर्म अकर्मण्यता की शिक्षा नहीं देता है अपितु कर्म फल के त्याग की शिक्षा देता है, तथा सिद्धि असिद्धि समस्त स्थितियों में कर्तापन के अभिमान से रहित समत्व बुद्धि को उत्पन्न करता है

 

सिद्ध्यसिद्भ्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते । 


(गीता 2 / 48 ) इस प्रकार कह सकते है कि निष्काम कर्म ईश्वरार्थ कर्म है और ईश्वरार्थ कर्म ही अनासक्त कर्म है। जो बन्धन का बाधक तथा मोक्ष का साधक है गीता में वर्णित है

 

ब्रह्मण्यधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोतियः ।

 लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ।।" (गीता 5 / 10 )