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गुरुवार, 25 अगस्त 2022

हरि सिंह नलवा कौन थे उनकी जानकारी |Hari Singh Nalwa: The Sikh Warrior

हरि सिंह नलवा कौन थे उनकी जानकारी 

हरि सिंह नलवा कौन थे उनकी जानकारी |Hari Singh Nalwa: The Sikh Warrior



हरि सिंह नलवा कौन थे उनकी जानकारी 

 

वह महाराजा रणजीत सिंह की सेना में सेनापति थे। 

 रणजीत सिंह पंजाब के सिख साम्राज्य के संस्थापक और महाराजा (1801-39) थे। 

वे कश्मीर, हजारा और पेशावर के गवर्नर रहे। 

उन्होंने अफगानों को हराया और अफगानिस्तान की सीमा के साथ विभिन्न क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया। 

 अफगानिस्तान को अविजित क्षेत्र कहा जाता था और यह हरि सिंह नलवा ही थे जिन्होंने पहली बार अफगानिस्तान सीमा और खैबर दर्रे के साथ कई क्षेत्रों पर नियंत्रण करके अफगानों को उत्तर-पश्चिम सीमांत को तबाह करने से रोका था। 

इस प्रकार उन्होंने अफगानों को खैबर दर्रे के माध्यम से पंजाब में प्रवेश करने से रोक दिया, जो कि 1000 ईस्वी से 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक विदेशी आक्रमणकारियों के लिये भारत में घुसने का एक मुख्य प्रवेश मार्ग का कार्य करता था। 

हरि सिंह नलवा ने अफगानिस्तान की एक जनजाति हज़ारा के हज़ारों सनिकों को हराया, जबकि हरि सिंह की ताकत हज़ारा के तीन गुना से भी कम थी। 

सरकार ने वर्ष 2013 में उनकी बहादुरी और पराक्रम के लिये नलवा के नाम पर एक डाक टिकट जारी किया।

 

लड़ाइयाँ जिनमें उन्होंने भाग लिया:

 

1807 कसूर की लड़ाई (वर्तमान पाकिस्तान में स्थित): इसमें हरि सिंह नलवा ने अफगानी शासक कुतुब-उद-दीन खान (Kutab-ud-din Khan) को हराया। 

अटक की लड़ाई (1813 में): नलवा ने अन्य कमांडरों के साथ अजीम खान और उसके भाई दोस्त मोहम्मद खान के खिलाफ जीत हासिल की, जो काबुल के शाह महमूद की ओर से लड़े थे और यह दुर्रानी पठानों पर सिखों की पहली बड़ी जीत थी।

वर्ष 1818 की पेशावर की लड़ाई: वर्ष 1818 में, नलवा के अधीन सिख सेना ने पेशावर की लड़ाई जीती और नलवा को वहा तैनात किया गया। वर्ष 1837 में नलवा ने ज़मरूद पर अधिकार कर लिया, जो खैबर दर्रे के माध्यम से अफगानिस्तान के प्रवेश द्वार पर एक किला था। 

 इतिहासकारों का कहना है कि यदि महाराजा रणजीत सिंह और उनके सेनापति हरि सिंह नलवा ने पेशावर और उत्तर पश्चिम सीमांत को नहीं जीता होता, जो कि अब वर्तमान पाकिस्तान का हिस्सा है, तो यह क्षेत्र अफगानिस्तान का हिस्सा हो सकता था और पंजाब तथा दिल्ली में अफगानों का आक्रमण कभी नहीं रुकता।